सावन में सियासत का मटन मसाला! ललन सिंह की दावत से कांग्रेस के पेट में दर्द?
Bihar News: बिहार में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, वैसे-वैसे नेताओं की सक्रियता और जनता को लुभाने की कोशिशें तेज होती जा रही हैं। कोई युवाओं को रोजगार का सपना दिखा रहा है तो कोई विकास की गारंटी दे रहा है। लेकिन जेडीयू के कद्दावर नेता और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने तो खेल ही पलट दिया। उन्होंने चुनावी दांवपेंच से हटकर सीधे स्वाद की राजनीति खेल दी—मटन पार्टी!
जी हां, लखीसराय के सूर्यगढ़ा में आयोजित इस मटन दावत में ललन सिंह के समर्थकों और कार्यकर्ताओं की भारी भीड़ उमड़ी। बड़े चाव से लोग बोटियां चूसते, मसालेदार मटन के स्वाद में डूबे नजर आए। इस दावत को लेकर जेडीयू खेमे में तो खुशी की लहर दौड़ गई, लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष, खासकर कांग्रेस, ने इस पर सियासी बवाल खड़ा कर दिया है।
कांग्रेस ने मटन पार्टी को सनातन धर्म और आस्था का अपमान बताया है। सावन के पवित्र महीने में इस तरह की दावत को उन्होंने भगवान शिव के अनुयायियों की भावनाओं से खिलवाड़ करार दिया। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार श्रावणी मेला और धार्मिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, दूसरी ओर उनके ही पार्टी के बड़े नेता सावन में मटन पार्टी करके धर्म का मजाक उड़ा रहे हैं।
कांग्रेस प्रवक्ताओं ने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की दोहरी राजनीति नहीं है? एक ओर धर्म की बात और दूसरी ओर आस्था पर प्रहार? पार्टी ने केंद्र सरकार को भी घेरा और पूछा कि क्या उनके मंत्री धार्मिक भावनाओं की कद्र नहीं करते?
हालांकि जेडीयू की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक सफाई नहीं आई है, लेकिन अंदरखाने से यह बात जरूर सामने आई है कि ललन सिंह की यह मटन पार्टी ‘स्थानीय कार्यकर्ताओं के सम्मान’ में आयोजित की गई थी और इसका धार्मिक भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है। पार्टी के कुछ नेताओं ने यह भी तर्क दिया कि राजनीति में भोज-भात और दावतें आम बात हैं, इसे ज्यादा तूल देना गलत है।
बहरहाल, सावन की भक्ति में डूबी जनता के बीच मटन की यह सियासी खुशबू अब तेजी से फैल रही है। सवाल उठता है कि क्या ललन सिंह की यह मटन पार्टी चुनावी रणनीति का हिस्सा थी या एक सियासी गलती? विपक्ष जहां इस मुद्दे को भुनाने में जुट गया है, वहीं जेडीयू इस बवाल को जल्द शांत करना चाहती है। अब देखना यह होगा कि जनता इस स्वाद को वोट में बदलती है या इसे सियासी ‘नमक हरामी’ मानकर तगड़ा जवाब देती है। फिलहाल तो बिहार की राजनीति में मटन का मसाला खूब चढ़ चुका है।



