नाबालिग बच्चियों की तस्करी पर बगहा अदालत का बड़ा फैसला, दो दोषियों को अंतिम सांस तक जेल और भारी जुर्माना

बिहार के पश्चिम चम्पारण जिले के बगहा से न्यायपालिका का एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। अदालत ने तीन मासूम बच्चियों को बहला-फुसलाकर बिहार से पश्चिम बंगाल ले जाने और उनकी तस्करी की साजिश रचने के मामले में दो दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। माननीय न्यायालय ने अपने फैसले में बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि मानव तस्करी न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह हमारे संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत देश के हर नागरिक को मिलने वाले गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार पर एक सीधा और क्रूर हमला है।
यह ऐतिहासिक फैसला बगहा के जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश-चतुर्थ मानवेन्द्र मिश्रा की अदालत द्वारा सुनाया गया है। अदालत ने नौरंगिया थाना कांड संख्या 05/2026 की सुनवाई पूरी करते हुए दोषी नियोती देवी और नागेश भुइयां को भारतीय न्याय संहिता की धारा 143(5) के तहत दोषी पाया। कोर्ट ने दोनों को सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोनों दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया गया है। यदि दोषी इस जुर्माने की राशि को भरने में असमर्थ रहते हैं, तो उन्हें तीन वर्ष की अतिरिक्त कठोर जेल की सजा काटनी होगी।
मामले के घटनाक्रम के अनुसार, दोनों दोषी मूल रूप से पश्चिम बंगाल के निवासी हैं। उन्होंने बगहा के आदिवासी बहुल इलाके से सात, आठ और ग्यारह वर्ष की तीन बेहद मासूम बच्चियों को अपने झांसे में लिया था। वे इन बच्चियों को लेकर पश्चिम बंगाल के आसनसोल जाने की फिराक में थे। हालांकि, उनकी इस घिनौनी साजिश की भनक पुलिस को लग गई। मानव व्यापार निरोध इकाई और नौरंगिया थाना पुलिस की संयुक्त टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपियों को तीनों बच्चियों के साथ मौके पर ही धर दबोचा। पुलिस ने आरोपियों के पास से बगहा से आसनसोल तक के रेल टिकट भी बरामद किए थे, जो इस अपराध का पुख्ता सबूत बने।
न्यायालय में मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने बेहद मजबूत पैरवी की। कोर्ट के समक्ष प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, पुलिस अधिकारियों की गवाही, बरामद किए गए रेल टिकट, जब्ती सूची और बच्चियों की उम्र के सत्यापन की रिपोर्ट जैसे ठोस साक्ष्य पेश किए गए। इन सभी सबूतों के आधार पर अदालत ने माना कि आरोपियों पर लगे बाल तस्करी के आरोप पूरी तरह सच साबित होते हैं। कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया कि आरोपियों का उन पीड़ित बच्चियों से कोई पारिवारिक या कानूनी रिश्ता नहीं था और वे बच्चियों को अपने साथ सफर पर ले जाने की कोई ठोस या वैध वजह बताने में पूरी तरह नाकाम रहे।
अपने इस मील का पत्थर साबित होने वाले फैसले में माननीय न्यायाधीश ने जोर देकर कहा कि मानव तस्करी हमारे संविधान के अनुच्छेद-23 का भी खुला उल्लंघन है। यह घिनौना कृत्य मानव गरिमा को तार-तार करता है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बच्चों की तस्करी जैसे बेहद संवेदनशील और जघन्य अपराधों से निपटने के लिए न्याय व्यवस्था में नरमी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की कोताही या रियायत समाज के हित में नहीं होगी।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, बगहा कोर्ट का यह फैसला मानव तस्करी के काले कारोबार में लिप्त संगठित गिरोहों के लिए एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश है। मासूम बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले अपराधियों के मन में इस फैसले से कानून का डर पैदा होगा और भविष्य में ऐसे अपराधों पर लगाम लगाने में यह फैसला मददगार साबित होगा।
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