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पतिलार के ‘राम-लक्ष्मण’ अशर्फी और गनपत यादव ने एक साथ त्यागे प्राण, एक ही चिता पर हुआ महाप्रयाण

गांव में शोक की लहर महावीरी अखाड़े की शान रहे दोनों बुजुर्ग भाइयों के अटूट प्रेम को देख रो पड़ा पूरा इलाका, अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब।

पतिलार पंचायत से भ्रातृ प्रेम और समर्पण की एक ऐसी मर्मस्पर्शी घटना सामने आई है, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दी हैं। यह वाकया महज दो वृद्धों के निधन का नहीं है, बल्कि उस अटूट रिश्ते की मिसाल है जिसे साक्षात् काल भी अलग नहीं कर पाया। गांव के लोग इसे कलयुग में ‘राम-लक्ष्मण’ की जोड़ी के अवसान के रूप में देख रहे हैं।

इलाके के बेहद सम्मानित बुजुर्ग अशर्फी यादव और उनके छोटे भाई गनपत यादव, जिनकी उम्र करीब 80 वर्ष थी, ने लगभग एक ही समय पर इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया। दोनों सगे भाइयों की एक साथ विदाई से पूरे परिवार सहित समूचा क्षेत्र गहरे शोक में डूब गया। इस हृदयविदारक संयोग के बाद दोनों भाइयों का अंतिम संस्कार भी एक साथ, एक ही चिता पर किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने नम आंखों से दोनों पुण्यात्माओं को विदाई दी।

ग्रामीणों ने बताया कि दोनों भाइयों के बीच बचपन से लेकर बुढ़ापे तक ऐसा अनन्य प्रेम था कि वे हर सुख-दुख में साये की तरह साथ रहते थे। अंतिम समय में भी दोनों ने एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ा, जिसे देख लोग कह उठे कि ऐसी मोहब्बत को मौत भी जुदा नहीं कर सकती।

पतिलार महावीरी अखाड़े के स्तंभ थे दोनों भाई

स्वर्गीय अशर्फी यादव और स्वर्गीय गनपत यादव केवल अपने परिवार के मुखिया नहीं थे, बल्कि पूरे पतिलार क्षेत्र की आन-बान और शान थे। अपने युवा दिनों में पतिलार महावीरी अखाड़े में उनकी वीरता, शारीरिक शौर्य और कड़े अनुशासन की दुहाई दी जाती थी। बुजुर्ग ग्रामीण याद करते हैं कि दंगल के मैदान में इस जोड़ी को चुनौती देना किसी के बस की बात नहीं थी। उनकी पहलवानी और सामाजिक प्रतिष्ठा आज भी लोगों के दिलों में रची-बसी है।

दोनों भाइयों ने अपने जीवनकाल में गांव की हर सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में अग्रणी भूमिका निभाई। उनकी सादगी, मधुर व्यवहार और मिलनसार व्यक्तित्व के कारण समाज का हर वर्ग उन्हें पूजनीय मानता था। वे हमेशा नई पीढ़ी को भाईचारे और कड़ी मेहनत की सीख दिया करते थे।

क्षेत्र में पसरा सन्नाटा, यादों में जिंदा रहेगा भाईचारा

अशर्फी यादव और गनपत यादव के एक साथ चले जाने की खबर जैसे ही फैली, पतिलार सहित आसपास के तमाम गांवों में सन्नाटा पसर गया। अपने चहेते बुजुर्गों के अंतिम दर्शन के लिए शुभचिंतकों और रिश्तेदारों का तांता लग गया। वहां मौजूद हर शख्स यही कह रहा था कि आज के दौर में ऐसा निश्छल भाईचारा और प्रेम देखने को मिलना दुर्लभ है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, दोनों भाइयों का यह आदर्श जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान सीख है। एक-दूसरे के प्रति उनका त्याग और समाज के लिए उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।

ईश्वर दिवंगत पुण्यात्माओं को अपने परमधाम में उत्तम स्थान प्रदान करें और इस वज्रपात को सहने के लिए शोकाकुल परिजनों को संबल दें। दोनों पवित्र आत्माओं को विनम्र श्रद्धांजलि। ॐ शांति।

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