चंपारण के लाल डॉ. प्रशांत रमण रवि को मिलेगा ‘विष्णु प्रभाकर स्मृति सम्मान’, यूट्यूब पर हिंदी साहित्य को दी नई पहचान
आज के डिजिटल युग में जहां युवा सोशल मीडिया पर मनोरंजन ढूंढ़ रहे हैं, वहीं डॉ. प्रशांत रमण रवि ने यूट्यूब को शिक्षा का एक मजबूत हथियार बनाया है।
पश्चिमी चंपारण: बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले डॉ. प्रशांत रमण रवि के नाम एक और बड़ी उपलब्धि जुड़ गई है। चंबा कॉलेज में कार्यरत डॉ. प्रशांत को इस वर्ष के प्रतिष्ठित ‘विष्णु प्रभाकर स्मृति सम्मान‘ से नवाजा जाएगा। यह खबर सामने आते ही उनके पैतृक गांव पतिलार समेत पूरे जिले में खुशी की लहर दौड़ गई है।
साहित्य के डिजिटल ‘मसीहा’ को ‘आवारा मसीहा’ के लेखक के नाम पर सम्मान
यह राष्ट्रीय पुरस्कार मशहूर रचना ‘आवारा मसीहा’ के लेखक विष्णु प्रभाकर की स्मृति में हर साल शिक्षा, कला, पत्रकारिता और समाज सेवा में शानदार काम करने वाले लोगों को दिया जाता है। इस बार शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार (Innovation) और अहम योगदान के लिए डॉ. प्रशांत को इस सम्मान के लिए चुना गया है।
उन्हें यह पुरस्कार खास तौर पर हिंदी साहित्य को डिजिटल दुनिया में घर-घर तक पहुंचाने और युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए दिया जा रहा है।
यूट्यूब से जगा रहे हैं साहित्य की अलख
आज के डिजिटल युग में जहां युवा सोशल मीडिया पर मनोरंजन ढूंढ़ रहे हैं, वहीं डॉ. प्रशांत रमण रवि ने यूट्यूब को शिक्षा का एक मजबूत हथियार बनाया है।
- सफलता के आंकड़े: उनके यूट्यूब चैनल पर वर्तमान में 1 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं और उनके वीडियोज को अब तक 10 मिलियन (1 करोड़) से ज्यादा बार देखा जा चुका है।
- कंटेंट: वे अपने चैनल के जरिए देश भर के छात्रों को हिंदी साहित्य, भाषा की बारीकियों और सही करियर चुनने के बारे में बेहतरीन मार्गदर्शन देते हैं। देश के कोने-कोने से छात्र उनके वीडियो देखकर लाभ उठा रहे हैं।
पतिलार गांव से शुरू हुआ था सफर
डॉ. प्रशांत की जड़ें पश्चिमी चंपारण के एक उन्नत गांव पतिलार से जुड़ी हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव के ही सरस्वती विद्या मंदिर में हुई है। उनके पिता श्री विश्वामित्र दुबे एक सेवानिवृत्त (रिटायर्ड) शिक्षक हैं, जिनसे प्रशांत को बचपन से ही शिक्षा और साहित्य के प्रति लगाव विरासत में मिला।
गांव और परिवार में जश्न का माहौल
बेटे की इस राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि पर पिता विश्वामित्र दुबे, उनकी माता और पूरे परिवार में हर्ष का माहौल है। जैसे ही यह खबर गांव पहुंची, सरस्वती विद्या मंदिर के उन शिक्षकों के चेहरों पर भी मुस्कान आ गई जिन्होंने कभी प्रशांत को ककहरा सिखाया था। ग्रामीण जनों और उनके शुभचिंतकों ने इस सफलता पर हर्ष जताते हुए कहा है कि प्रशांत ने न सिर्फ गांव का बल्कि पूरे बिहार का नाम देश भर में रोशन किया है।
डॉ. प्रशांत रमण रवि का यह सफर उन सभी युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी मेहनत, लगन और तकनीक के सही इस्तेमाल से दुनिया में बड़ा मुकाम हासिल करना चाहते हैं।
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